Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
कौशेयकामिनीहारकुसुमास्तरणानिलाः ।
निर्विघ्नमभितः स्पृष्टा भृशमाभोगभूमिषु ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
रेशमी मुलायम वस्त्रों, सुन्दर
कान्ताओं, अनेक तरह के हारो, पुष्पशय्याओं तथा शीतल-मन्द-सुगन्ध युक्त पवन का भी मैंने
भोगभूमियों में सर्वत्र निर्विघ्नतापूर्वक खूब स्पर्श किया है