Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
श्रुतं स्पृष्टं तथा दृष्टं भुक्तं घ्रातं पुनः पुनः ।
संशुष्कविरसं भूयः किं भजामि वदाशु मे ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, मैंने शब्दादि विषयों का खूब श्रवण, स्पर्श और अवलोकन किया । विविध रसों का खूब
आस्वाद लिया, तरह-तरह के फूलों को खूब सूँघा । महर्षे, पुनः पुनः इन विषयों का उपभोग करने
से ये सबके सब विषय मेरे लिए सूखे काठ की नाई बिलकुल नीरस हो चुके हैं । एेसी स्थिति में ये
विषय तो मेरे लिए एक तरह से वान्ताशनप्राय (वमन को खाने के सदृश) बन गये हैं, अतः हे
भगवन् मुझसे शीघ्र कहिये, अब मैं किसका सेवन करूँ ?