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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

अविवेकिष्वमित्राणि मित्राणि च विवेकिषु । गहनानन्तशून्यानि काननानीन्द्रियाणि च ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

अविवेकियों के शत्रु और विवेकियों के मित्र, गहन, निरवधि तथा जनविश्रान्तिशून्य ये कानन और इन्द्रियगण तुल्य हैं