Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
पातनैकान्तदक्षाणि दोषाशीविषवन्ति च ।
रूक्षकण्टकलक्षाणि श्वभ्राग्राणीन्द्रियाणि च ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
नीचे गिराने में अत्यन्त निपुण, दोषाशीविषवाले (73) तथा रूखे लाखों कण्टकां
से (७) युक्त जीर्ण गङ्ख के मुख और ये इन्द्रियं तुल्य हैं