Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
अन्तःशून्यान्यसाराणि वक्राणि ग्रन्थिमन्ति च ।
दहनैकार्थयोग्यानि दुर्दारूणीन्द्रियाणि च ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
भीतर में खोखले, असार, वक्र, गठयुक्त, एकमात्र जलाने में
उपयोगी जीर्णं बाँस आदि की लकड़ियाँ ओर इन्द्र्यो एक-सी है