Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
घनमोहप्रबन्धीनि दुष्कूपगहनानि च ।
महावकरतुच्छानि कुपुराणीन्द्रियाणि च ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
घनीभूत मोहादि के
द्वारा चौर्य, कलह, दूत आदि दुर्व्यसनों में प्रबन्धनशील, दुष्टकूपों से गहन तथा महाअवकरों
से (ॐ) तुच्छ असज्जनों के नगर और ये इन्द्रियों समान हैं