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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

आकाशकोशसदना शशाङ्ककरसुन्दरी । मुक्ताकलापरचना कान्ता मदनुसारिणी ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश का कोश ही उसके रहने का घर था, वह सुन्दर तो इतनी थी कि जितनी शशांक चन्द्रमा की किरणें । उसने मोतियों का बनाया गया अर्धचन्द्राकार हार पहना था ओर उसकी चेष्टा मेरी ओर आने की मालूम होती थी