Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जैसे मन के स्रंकल्प से जनित यक्षनगरर आदि केवल मनोरुप हैं; वैसे ही विशुद्ध बिति के
सकल्य से जनित ये भाव भी विशुद्ध चितिरुप ही हैं; इस आशय से कहते हैं /
समस्त आकारों से रहित स्वच्छ चितिमात्रस्वरूप आत्मा दृश्य की कल्पना करके अधीन हो
जाता है । ठीक ही है, जो बालक अपने हृदय में मन से जिस यक्ष की कल्पना करता है, वह उसके
अधीन हो ही जाता है