Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यह कव तो ठीक हैं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि जगत् अविनाशी कैसे 2 इसका उत्तर
यह है -अविनाशी ब्रह्म का वह अवयव हैं, इससे इस आशय को लेकर वृक्षशाखा के द्ष्टान्त
से वर्णन करते हैं /
भद्र, जैसे अवयवों से युक्त वृक्ष के शाखा, स्कन्ध, फल, पल्लव, पुष्प आदि अवयव (अंग)
हैं वैसे ही आकाश से भी अत्यन्त स्वच्छ, व्यपदेश (निरूपण) के अयोग्य, परमार्थघन चेतनरूप
आत्मा के प्रलय, महाप्रलय, नाश, उत्पत्ति, भाव, अभाव,सुख, दुःख, जन्म, मरण, साकार,
निराकार आदि अवयव हें । अतः जैसे यह आत्मारूपी अवयवी अविनाशी और वर्णनातीत हे वैसे
ही सर्ग, प्रलय आदि अवयव भी अविनाशी एवं वर्णनातीत हैं