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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

अवयव और अवयवी के अभेद का, वृक्ष और वर्ष के अवयवो की समानता बतलाकर,निरुपण करते हैं / जैसे वृक्ष के अस्तित्व में मूलभूत कारण वृक्षज्ञान है, वैसे ही परमार्थघन आत्मा के जगत्‌ के अस्तित्व में ज्ञान ही मूलभूत कारण है, (इसलिए समानता ग्रप्निद्ध ही है ऐसी स्थिति में ज्ञानऊरूप मूल के आधारपर ही किसी-किसी प्रदेश में जो कुछ विचित्रता है, उसका वृक्ष के सद्ृश परिज्ञान करना चाहिए / जैसे-/ परमार्थघन परमात्म वृक्ष का कहीं पर सृष्टि रूप मध्यकाष्ठ है, कहीं पर लोकान्तररूप तने हैं, कहीं पर जम्बूद्वीप आदि व्यवस्थात्मक शाखाएँ हैं, कहीं पर पदार्थ रूप पल्ल्व हैं, कहीं पर प्रकाशरूप फूल हैं, कहींपर अन्धकाररूप हरित पत्तों की हरियाली है, कहीं पर आकाशरूप कोटर हैं, कहीं पर प्रलयरूप गुल्म (गाँठे) हैं, कहीं पर हरिहर आदि उत्तम देवतारूप गुच्छे हैं, कहीं पर जड़त्वरूप छिलके हैं । इस प्रकार निराकार आकाशरूप ही आकारविशेषों से संविदात्मक ब्रह्म में प्रतीत होता है और वह ब्रह्म के सदुश स्वच्छ स्वभाव होने के कारण उससे अभिन्न बनकर ही स्थित हैं