Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
इसी अर्थ को कहते हैं।
भद्र, जितने भविष्यकाल के पदार्थ हैं , जितने भूतकाल के पदार्थ हैं,जितने वर्तमान काल के
पदार्थ हैं, जितने सर्ग हैं, जितने प्रलय हैं, वे सब अनुभव से ही सिद्ध होते हैं, अतः अनुभवरूप हैं
और अनुभव स्वसत्तात्मक आत्मा ही है, इसलिए यों सब कुछ ब्रह्मरूप ही अचल स्थित है