Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
तब उल प्रकार के विश्रम में कोन हेतु है ओर उसकी शान्ति कैसे होती हैं, इस पर कहते हैं ।
आत्मा के तात्त्विक स्वरूप का अपरिज्ञान ही उसमें दोष-सा बनकर स्थित हो गया है, इसलिए
बाह्मदृष्टि को हटाकर केवल प्रत्यगात्मा की ओर लगाई गयी बुद्धि से यदि विचार किये जाते हैं, तो
उसी विचार से वह नष्ट हो जाता है