Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, यह अनादि जगत्-रूपी जाल कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं है परन्तु जो यह कुछ
वर्णित जीव आदिरूप जगत् भासता है, वह तो भोग और मोक्ष चाहने वाला यानी अपने तात्त्विक
स्वरूप को न जानने वाला ब्रह्म ही है । वर्णित विचारदृष्टि से अणिमा आदि आठ गुणों से युक्त
सर्वेश्वर भी मायारूप होने से असार है । इस प्रकार के ऊँचे वैराग्य से ईश्वररूपता को तृणरूप
समझ रहा कोई अधिकारी पुरुष अपने में निरतिशयानन्दरूप ब्रह्मरूपता का निश्चय कर अपनी
आत्मा में पूर्ण संतुष्ट हो स्थित रहता है