Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
दिव्या दृगद्रिसंस्थस्य तथा योजनकोटिगान् ।
भावान्वेत्ति बहिश्चान्तरेवं तद्बुद्धवानहम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
एक ही ज्ञान से व्यवहित तथा दरस्थ पदार्थों का दर्शन आपको कले हुआ, इस आशंका पर
दष्टा द्वारा इसका संभव बतलाते हैं /
पर्वत पर स्थित पुरुष की दिव्य दृष्टि जैसे करोड़ों योजन पर स्थित बाह्य और आभ्यन्तर
पदार्थों को देखती है, वैसे ही मैंने भी ये सब जगत् देखे