Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
ब्रह्मन्ननुभवत्येवं त्वयि तामरसेक्षण ।
सा किं कृतवती ब्रूहि कान्ताऽर्यापाठपाठिनी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे कमललोचन ब्रह्मन्, जब आप इस तरह अनुभव कर रहे थे, तब
आर्या छन्द पढ़नेवाली उस कान्ता ने क्या किया, वह कहिये