Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रूपालोकमनस्काराः शब्दपाठवचांसि च ।
यथा स्वप्ने नभस्येव सन्ति तत्र तथाम्बरे ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
कल्पना से यह सव कुछ उत्पन्न हैं, इसमें स्वप्नद्रष्टान्त ही प्रमाण हैं; यह उत्तर देते हैं
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्वप्न मेँ बाह्य ओर आभ्यन्तर ज्ञान,
शब्दपाठ तथा वचन आकाश में ही स्थित रहते हैं वैसे ही वे सभी पदार्थं उस चिदाकाश मेँ
ही रह रहे हैं