Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
क्वचित्तपद्दिनकरजनताचारसुन्दरः ।
क्वचिन्नैशतमोगेहनृत्यन्मत्तनिशाचरः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर तप रहे सूर्य और
जनता के आचरण से सुन्दर है तो कहीं पर रात के अन्धकाररूप घर में मत्त निशाचर नृत्य कर रहे
हँ । अतएव बीभत्स भी हैं