Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
तेन यौवनसंपन्नविलासरसशालिनी ।
तं विना व्यसनेनाहं दह्येऽग्नाविव पद्मिनी ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, मैं अधिक क्या कहूँ, पति के साथ मैं
यौवन से प्राप्त हुए भोगविलास की इच्छा रखती हूँ यानी अपने मनोरथ से ही उन्हें पति मान चुकी
हूँ । इसलिए उनको भोगों के व्यसन से रहित देखकर मैं ऐसे जल रही हूँ, जैसे अग्नि मे कमलिनि