Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
अप्राप्ताभिमतार्थानामविश्रान्तधियां परे ।
मरणैरुह्यमानानां जीवितान्मरणं वरम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय में भी, जब कि आप- जैसे उपदेशकर्ता का मुझे लाभ भी हो गया है तब, में यदि
विश्रान्ति की इच्छा न करूँ, तो मरण होना ही अच्छा है, इस आशय से कहती हे /
महाराज, जिन्होंने अपने अभीष्ट अर्थ प्राप्त नहीं किये हैं और परम आत्मपद में जिनकी
बुद्धि विश्रान्त नहीं हुई है, ऐसे मरणतुल्य दुःखों के प्रवाह में बह रहे मनुष्य का जीने की अपेक्षा
मरण ही अच्छा है