Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
स मद्भर्ताद्य निर्वाणमीहमानो दिवानिशम् ।
राजा राज्ञेव मनसा मनो जेतुं प्रबुध्यते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सहधर्मचारिणी सियो का पति के समान ही स्वभाव रहना उचित हे / इसलिए पति के साथ
में ही हमको उपदेश देना चाहिए, ऐसा कहती ह /
आज भी मुक्ति की इच्छा कर रहे वह मेरे पति रात-दिन मन से मन पर विजय पाने के लिए
उस प्रकार तैयार हैं, जिस प्रकार राजा राजा की सहायता से दूसरे राजा के ऊपर विजय पाने के
लिए तैयार रहता है