Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मंस्तस्य च मद्भर्तुर्मम चाज्ञानशान्तये ।
न्यायोपपन्नया वाचा कुरु स्मरणमात्मनः ओ ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, उस मेरे पति का और मेरा जो अज्ञान है, उसका विनाश
करने के लिए आप न्याययुक्त उपदेशवाणी से, विस्मृत कण्ठहार के सदुश, आत्मा का बोधन
कीजिए