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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 66, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

अनन्तविपुलागाधगम्भीरे कालसागरे । उत्पत्त्योत्पत्त्य लीयन्ते ते त्वावर्तविवर्तया ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

अनन्त, अगाध, पुष्कल एवं गम्भीर कालरूपी महासागर में आवर्तं ओर विवर्तरूप कालगति से वे सुरासुर आदि जलजन्तु उत्पन्न हो होकर लीन हो जाते हैं