Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 66, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
भुवनं बोधयन्ती द्यौश्चन्द्रार्ककरचामरैः ।
स्थिताकाशांशुकाकल्पतारकोत्करशेखरा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ के सदृश वहाँ पर भी दयु शुभ्र आकाशरूप वस्त्र धारणकर तथा मस्तक
में कल्पपर्यन्त तारों का समूह धारण कर चन्द्रसूर्यरूपी दो चामरो को मानों डुलाती हुई सातां
भुवनो को जागृत करती है