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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

ममातिसुचिराभ्यस्तमपि व्योम लतामिव । गतं निजं जगदिदं यतः पश्यामि न स्फुटम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

मेरा भी यहाँ जो जगत था वह प्रायः नष्ट ही हो चुका है, क्योकि यद्यपि उसका भने चिरकाल तक अभ्यास किया है, फिर भी अब आकाशलता के सदृश स्पष्ट नहीं दीखता