Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
अबन्धुर्बन्धुतामेति नैकट्याभ्यासयोगतः ।
यात्यनभ्यासतो दूरात्स्नेहो बन्धुषु तानवम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
समीप के कारण अभ्यासयोग से ही अबन्धु-बन्धुरूप बन जाता है और दूरी के कारण अनभ्यास से
बन्धुओं में भी स्नेह थोड़ा हो जाता है