Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
इष्टवस्तु चिराभ्यासभास्वान्भासयति प्रजाः ।
तथेन्द्रियाख्यां देहोर्व्यां रात्रिं पश्यन्ति नो यथा ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
देहरूपी पृथ्वी पर चिरकालिक आत्मविचाराभ्यासरूपी सूर्य अपनी अभीष्ट वस्तु को (परम प्रेम
के विषय आत्मा को) उस तरीके से दिखलाता है, जिस तरीके से कि उत्तम जन्म लेनेवाले
अधिकारी जन राग, द्वेष, जन्म, मरण आदि हजारों अनर्थो को पैदा करनेवाली इन्द्रियरूप रात्रि
को न देख पायें