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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

पौनःपुन्येन करणमभ्यास इति कथ्यते । पुरुषार्थः स एवेह तेनास्ति न विना गतिः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

अब अभ्यास का स्वरूप बतलाती है / महाराज, किसी एक (क्रिया) का बार-बार करना ही अभ्यास कहा जाता है । उसीका इस शास्त्र में पुरूषार्थ शब्द से पहले अनेक बार वर्णन किया गया है, पुरुषप्रयत्न और परमपुरुषार्थ रूप फल भी वास्तव में वही है, इसलिए अभ्यास के बिना यहाँ किसी की गति हो ही नहीं सकती