Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
आधिभौतिकचिद्रूढा ह्यातिवाहिकदेहके ।
मरौ मरीचिकास्वेव यथा मिथ्यैव वारिधीः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
सूक्ष्म शरीरउपहित चिति मेँ आधिभौतिकता की प्रथा यानी स्थूल
शरीररुपता की बुद्धि मिथ्या ही एेसे प्रादुर्भूत हुई है जैसे मरूभूमि की मृगतृष्णा में जलबुद्धि व्यर्थ ही
प्रादुर्भूत होती है