Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
शुक्तौ रजतता तापे जलतेन्दौ यथा द्विता ।
आधिभौतिकता तद्वन्माययैवातिवाहिके ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शुक्ति में रजत, जैसे मृगतृष्णा मे जल और जैसे चन्द्रमा में दो चन्द्र की बुद्धि
मिथ्या है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर में स्थूलबुद्धि भी माया ही मिथ्या है