Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
स्वप्ने द्रष्टुः खमेवाद्रिर्गृहे नान्यस्य वै यथा ।
तथा तद्भावनवतोरावयोः सा शिलैव चित् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्वप्न में पर्वत देखनेवाले का प्रसिद्ध
स्वप्न उस समय भी शून्यरूप ही है, क्योकि उसी घर और उसी समय में जाग रहे या सो रहे किसी
अन्य पुरुष को वह पर्वत नहीं है, वैसे ही शिला की भावना से युक्त हम दोनों को यह दृश्य भी शिला
चिद्रूप ही है