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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

अन्यजगद्ब्रह्मोवाच । अथाहं चिन्मयाकाशस्त्वन्याकाशमयीं स्थितिम् । परां ग्रहीतुमिच्छामि तेनेहोपस्थितः क्षयः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

आपने इसका पत्नी के निमित्त निर्माण क्यो किया, उत प्रश्न का उत्तर देकर अब इसको वैराग्य की ओर क्यों ले गये, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए आरम्भ करते हैं / अन्य जगत्‌ के ब्रह्माजी ने कहा : हे वसिष्ठजी, मैंने अपने संकल्प से कल्पित दो परार्धं वर्ष आयु के बिता दिये, अब चित्ताकाशरूप मैं सबसे ऊँची निरतिशयानन्दात्मक ब्रह्माकाशरूप कैवल्यस्थिति लेने की इच्छा कर रहा हूँ, इस कारण से मेरी वासना से बने इस जगत्‌ में नित्य, नैमित्तिक, दैनंदिन और आत्यन्तिक-ये चारों तरह के प्रलय भी उपस्थित हो गये हैं

सर्ग सन्दर्भ

उनहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सत्तरवाँ सर्ग वासना देवी के वैराग्य के कारण का और जगत्‌ के प्रलय एवं मिथ्या विभ्रमरूपत्व का वर्णन।