Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आत्मतत्त्वं नु पश्यन्त्या धारणाभ्यासयोगतः ।
दृष्टोऽनया भवत्सर्गो वर्गव्यग्रनिरर्गलः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तब इसने हम लोगों का जो ब्रह्माण्ड देखा, उसमें क्या कारण है, इस पर कहते हैं /
आत्मा के दर्शन के लिए किये गये धारणाभ्यासरूप योग का फल अन्यान्य ब्रह्माण्ड मेँ गमन
आदि सिद्धि है ही, इसलिए उसकी परीक्षा करने की इच्छा ही वहाँ जाने में कारण हुई । वहाँ जाकर
इसने आपका वह सर्ग देखा, जिसमें धर्मादि के अनुष्ठान में व्यग्र एवं निरर्गल प्रजा रहती है