Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जगन्नाम मुधा भ्रान्तिः किल स्वप्नपुरोपमा ।
मिथ्यैवेयं क्व नामासौ चिद्रूपास्त्यथ नास्ति च ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् नाम की तो एक निरर्थक भ्रान्ति ही है, ओर
वह है ठीक स्वप्ननगर के जैसी । यह जगत् की माया भी मिथ्या है, इसलिए मिथ्या भ्रमका
अस्तित्व ही कहाँ रहा ? यदि उसका अस्तित्व है, तो वह अधिष्ठान चितिरूप होकर कुछ और
ही है, न कि प्रतीयमान जड़रूप