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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verses 25–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

नीरसाशेषदेशान्ता सर्वर्तुगुणवर्जिता । इत्यस्य पार्थिवे धातौ ब्रह्मणो गतवेदने ॥ २५ ॥ पृथिवी पृथुवैधुर्या संपन्नासन्ननाशतः । अथ तत्संविदुन्मुक्तो जलधातुः क्षयोन्मुखः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, उस समय पृथ्वी मे ऋतुओं ने अपना-अपना गुण- स्वभाव छोड़ दिया ओर उसके सभी प्रदेशों की सीमाएँ नीरस हो गयीं । इस तरह ब्रह्माजी के विराट्‌ शरीर को बनाने वाला पार्थिव भाग जब चैतन्य में मिल गया, तब पृथ्वी की विशालता समीपवर्ती प्रलय के कारण विलीन हो गई, तदन्तर चेतनरूप संवित्‌से निर्मुक्त जल भी विनाश की ओर उन्मुख हो गया