Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
सरसेन विभोर्नाशैर्विशङ्कितमहानलाः ।
मिलच्छिखरिमालाग्रजलमातङ्गयोधिनः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, सभी समुद्रों में एक अजीब-सा दृश्य उपस्थित हो गया, समुद्रजल से अपने आश्रयभूत इन्धनों
के विनाश की आशंका से महानल (बड़नावाग्नि) भयग्रस्त होकर छिप जाने लगे ओर पर्वतमालाओं
के ऊपर जलमातंग स्थलमातंगों के साथ भिड़कर युद्ध करने में व्यस्त हो गये