Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
हेमरत्नमया मुक्ताः सिन्दूरभुजगा इव ।
ककुब्भ्यो नभसो भूमेरुदगुर्दग्धदिक्तटाः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
दिशातटों
को दग्ध कर देनेवाली तथा चंचल ज्वालारूप जटाओं के आरोप से युक्त अनेक प्रकार की उत्पातां
की पंक्तियाँ दिशाओं से, आकाश से एवं पृथ्वी से आने लगीं