Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
प्रभ्रमन्त्योऽम्बरे कल्पमारुतैस्तनुतूलवत् ।
स्वशक्त्यपचये मूकाः सिद्धसंततयोऽपतन् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
खेचर आदि स़िद्धियाँ विनाशी एवं तुच्छ हैं; इसको सवित करते हुए कहते हैं /
जब अपनी शक्ति का विनाश हो गया, तब प्रलय के पवनों से छोटे तुलके सदृश आकाशमण्डल
में उड़ती हुई, शब्दोच्चारण में भी असमर्थ सिद्धों की पंक्तियों की पंक्तियाँ आकाश से गिरने
लगीं