Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
चिद्भावोऽनुभवत्यन्तश्चित्त्वाच्चिदणुतां निजाम् ।
तामेव पश्यतीवाथ ततो द्रष्टेव तिष्ठति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने ब्रह्मशन्दार्थ की जो भावना करता है, उसमे कारण उसकी चित्स्वभावता ही है, यह
कहते हैं /
चितिस्वरूप आत्मा अपने भीतर विलीन हुए अपने सूक्ष्म जगत्संस्कार का जो अनुभव करता
है, इसमें कारण उसकी चितिरूपता ही है, इसी से उसे मानों देखता है । इसके बाद स्वयं वह
द्रष्टा-सा बनकर स्थित हो जाता है