Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्ने मृतं पश्यत्येक एवात्मनात्मनि ।
मृत एव मृतेर्द्रष्टा तथा चिदणुरात्मनि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
एक वतु में विरुद्ध द्ृश्य-द्रष्टा के धर्म नहीं हो सकते, यदि यह शंका हो, तो इसका समाधान
यह है कि स्वप्न के सद्रश विरोध का पर्यालोचन न होने से कैसा हो सकता हैं, यह कहते हैं /
जैसे एक ही पुरुष स्वप्न में अपने आप अपनी आत्मा में अपने को मृत देखता है, इससे यह
बात आ गई कि मृत ही मरण का द्रष्टा है ठीक वैसे ही अणुचिति अपनी आत्मा में उक्त अणुता
देखती है यानी स्वयं दृश्य ओर द्रष्टा हो जाती है