Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ततश्चिद्भाव एषोऽन्तरेक एव द्वितामिव ।
पश्यन्स्वरूप एवास्ते द्रष्टृदृश्यमिव स्थितः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी कल्पना करने पर भी वास्तव में ऐक्य की क्षाति नहीं होती, यह कहते हैं /
तदन्तर यह चिदाकाश स्वरूपतः एक होते हुए भी अपने भीतर द्वैत-सा देखता है और यों
देखता हुआ द्रष्टा एवं दृश्य-सा बनकर अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है