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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verses 5–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदिदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजङ्गमम् । सर्वं सर्वप्रकाराढ्यं देशकालक्रियादिमत् ॥ ५ ॥ तस्य नाशे महानाशे महाप्रलयनामनि । ब्रह्मोपेन्द्रमरुद्रुद्रमहेन्द्रपरिणामिनि ॥ ६ ॥ शिष्यते शान्तमत्यच्छं किमप्यजमनादि सत् । यतो वाचो निवर्तन्ते किमन्यदवगम्यते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, यह जो कुछ स्थावर-जंगमरूप, नाना प्रकार के धर्मों से पूर्ण एवं देश, काल, क्रिया आदि से युक्त पूरा जगत्‌ दिखाई देता है, उसका महाप्रलय शब्द से कहे जानेवाले महानाश में यानी प्राकृत प्रलय में (जब कि स्थूल भूतों का सूक्ष्मभूतों में नाश हो जाने पर भूतसूक्ष्मों के साथ अव्याकृत में प्रवेश हो जाता है, तब) जिसमें कि ब्रह्मा, उपेन्द्र, मरुत्‌, रुद्र, महेन्द्र, आदि के शरीरों का अन्तिम भावविकार हो जाता है-शान्त, अतिस्वच्छ, अज, अनादि एवं सद्रूप कोई वस्तु बच जाती है । उससे सभी वाणी भी निवृत्त हो जाती है यानी किसी तरह की वाणी उसे कह नहीं सकती , इसे छोड़कर दूसरा कोई भी अपने लायक पदार्थ नहीं है