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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 34–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 34-36

संस्कृत श्लोक

स्थलपद्मोदरालीनामाजहुः श्रियमश्रियः । सद्यो निःसृतरक्ताभैः सिन्दूराम्भोदसुन्दरैः ॥ ३४ ॥ धगद्धगिति गायद्भिर्ज्वालाजालैर्जगद्गतैः । आसीद्रक्तांशुकैः कीर्णं संध्याभ्रैरिव वा नभः ॥ ३५ ॥ उत्फुल्लकिंशुकवनैरुड्डीनैरिव वाऽऽवृतम् । और्वेण चावृता आसन्फुल्लाशोकवना इव ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पत्तिरहित उन सब दिशाओं ने तत्काल निकले हुए रक्त के सदृश ज्वालाजालों से, जो सिन्दुरी रंग के मेघो की तरह सुन्दर थे, स्थल कमल के उदर मेँ लीन शोभा को धारण किया। धक्‌ -धक्‌ शब्दों से गाते हुए सारे संसार में व्याप्त ज्वालाओं के जालो से आकाश मानों रक्त वसरं से या सन्ध्याकालीन मेघो से आकीर्ण हो गया । अथवा यह भी कह सकते हैं कि ज्वालासमूहों से आवृत वह सारा आकाश ऐसा प्रतीत होने लगा मानों उड़कर वहाँ ले गये विकसित किंशुक के वनों से ढँका हो । हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी ही दशा सम्पूर्ण सागरो की भी हो गई, बड़वानल से संवृत्त सारे सागर भी ऐसे हो गये, मानों उनमें अशोक के वन खिल गये हों, या स्थल कमलों से वे संवलित हो गये हों अथवा प्रातःकालीन सूर्य के समूहों से वे व्याप्त हो चुके हों