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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 37,38

संस्कृत श्लोक

इव स्थलाब्जवलिता राविरा इव चार्णवाः । नानावर्णज्वलज्ज्वालाधूमविन्यासबन्धवान् ॥ ३७ ॥ रूढं वह्निमिवाधातुं चित्रसौधलताश्रयम् । अनन्त इव विन्यास वनयौवनपावकः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

युवावस्था को प्राप्त दावानल चित्रलिखित कोठों पर की मिथ्या अग्नि को मानों यथार्थं अग्नि बनाने के लिए नाना वर्णो की प्रज्वलित हो रही ज्वालाओं तथा धूम्र विन्यासो की श्रेणिवाला होता हुआ, हजार फणाओं की श्रेणिवाले सर्पराज के समान, विस्तार को प्राप्त हो गया, अनेक सूर्यो के उदय ओर अस्त आदि से विन्ध्याचल भी विधुरता को प्राप्त हो गया