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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 76, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

प्रसृतप्रलयाख्येन्द्रमत्तैरावतबृंहितम् । आकल्पक्षुब्धमेघाब्धिनिर्ह्रादमिव संभृतम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

वह ध्वनि क्या थी, विजय पाने के लिए प्रस्थान किये हुए महाप्रलय नामक इन्द्र के मत्त ऐरावत हाथी की गर्जना-सी थी । ओर सुनिये-वह शब्द क्या था, कल्पकालतक रोके जाने से क्षुब्द हुए मेघरूपी समुद्रो का दीर्घकाल से संचित एक ही समय में निकला हुआ निर्घोष सा था