Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 76, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अर्णवेष्वनलार्णस्सु क्वथनोत्फालवारिषु ।
वनेष्वस्मृतपर्णेषु दीप्ताग्नितरुधारिषु ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जब समुद्र अग्निरूपी जल से लबालब तथा
काढे के सदृश उछलते हुए जल से पूर्ण हो गये और सारे जंगल पत्तों के स्मरण से शून्य
(पत्रशून्य) एवं प्रदीप्त अग्निरूपी वृक्षों के आधार बन गये (तब कल्पान्त के मेघ आने
लगे)