Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 76, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
लोकार्णवपुरोद्गीर्णघनकोलाहलोल्वणम् ।
एतत्कुलाचलस्कन्धबद्धोग्ररवघर्घरम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक, समुद्र एवं नगरों में
प्रतिध्वनि के रूप से उत्पन्न घन कोलाहलो के कारण वह सही नहीं जा सकती थी तथा पूर्व
में वर्णित कुलाचल पर्वतों के कन्धों पर सम्बद्ध दाह के उग्र शब्दों के साथ मिल जाने के कारण
(५) गुल्म -एेसा पौधा जो एक जड़ से कई होकर निकले और जिसमें कड़ी लकड़ी तथा डंठल
न हो । जैसे-ईख, शर आदि । अर्कप्रकाश में गुल्मगण के अन्तर्गत बरियारा, पाठा, तुलसी,
काकजंघा, चिरचिरा आदि पौधे लिये गये हैं ।
(८) अथवा मेघो को उत्पन्न करनेवाले ।
वह घर्घर ध्वनि बडी ही भयानक लगती थी