Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
डीनोड्डीनैः परिवृतं विचलद्वातवेल्लितैः ।
दग्धादग्धैः पदार्थैः खे शीर्णपर्णगणैरिव ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशमण्डल में जीर्ण शीर्णं
पत्तों के समूहो के सदृश चंचल वायुओं के द्वारा वेल्लित अतएव गिर रहे, उड रहे दग्ध, अर्धदग्ध
आदि पदार्थों से तीनों लोक व्याप्त थे-ऐसे पदार्थों की उस समय जगत् में भरमार दिखाई दे रही
(7)) ज्ञान के बिना, हजारों विपत्तियं के उपस्थित होनेपर भी अज्ञानियोँ की वैरदृष्टि कभी
शान्त नहीं होती । वह वैरदृष्टि विपत्तियं से भी बढ़कर महाविपत्स्वरूप है, इसलिए प्रत्येक प्राणी
को चाहिए कि वह ज्ञानप्राप्ति के लिए कुछ भी उठा न रखे, यह इसका गूढ़ अभिप्राय है ।
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