Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
आवर्तघर्घरारावा मिथो विदलनोद्यताः ।
जुघूर्णुरर्णवाकीर्णपर्णवत्प्रौढपर्वताः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
आवर्त के सदुश घर-घर ध्वनि करनेवाले ओर परस्पर विदलन करने
में उद्यत प्रौढ पर्वत, समुद्र में बिखरे पत्तों के सदृश, घूर्णित हो रहे थे