Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
क्रन्दच्छिष्टामरगणं चलत्सज्जीवभूतकम् ।
भ्रमत्केतुशतोत्पातं दुष्प्रेक्ष्यमभवज्जगत् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, शिष्ट ओर
देवगण उसमें क्रन्दन कर रहे थे, थोडे से जीवन से युक्त दया के पात्र प्राणी रेंग रहे थे, सैकड़ों
धूमकेतुओं के उत्पात उठ रहे थे, इससे जगत् अत्यन्त दुष्प्रेक्ष्य हो रहा था