Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
जगदासीत्पतच्छृङ्गस्थूलधारौधनिर्भरम् ।
वहद्वहद्गिरिपुरवातपूर्णसरिच्छतम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय सम्पूर्ण त्रैलोक्य पर्वत शिखरो के सदृश मोटी-मोटी गिर रही
जलधाराओं के निर्झरों से आक्रान्त होकर पर्वतो तथा नगरों के समूहों को भी बहा देनेवाली परिपूर्ण
सैकड़ों नदियों से बहने लग गया